Friday, 2 July 2010

आधुनिकता का जंगल

इस मकानों के जंगल में चिल्ल पों का शोर सुनाई देता है ,
हवा से बातें करती ट्रेन और गाडियों का ताँता दिखाई देता है ,
गगन चुम्बी चिमनियो से निकलता धुआं दिखाई देता है,
रफ़्तार से दौड़ता हर इंसान परेशां दिखाई देता है ,

यहाँ पपीहे की पीहू पीहू नहीं सुनाई देती ,
ही मयूर नाचता दिखाई देता है,
हर इंसान इस शोर से बहरा हो गया है,
आधुनिकता के मंच पर मौत का तांडव दिखाई देता है,

क्यों आज इंसान को जंगल की जरुरत नहीं रही,
क्यों आज प्रकर्ति से उसे मोहोब्बत नहीं रही,
क्यों इमारतों से उसे इश्क हो गया है,
क्यों प्रकर्ति से इंसान बेवफ़ा हो गया है,

सुख सुविधाओ से लैस है हर कोई ,
फिर भी हर सख्श जरुरत मंद दिखाई देता है,
ख्वाहिश की कोई सीमा है,
लालच की पराकाष्ठा,
एक दुसरे की चीज पर इंसान लार टपकाता नजर आता है ,


यहाँ किसी के बाँट में धन कुबेर आता है ,
तो कोई रस्ते पे कटोरा लिए खड़ा दिखाई देता है ,
भगवान् ने हम सबको एक नजर से तौला है ,
इंसान का तो कांटा ही ख़राब दिखाई देता है ,

इस धरती को ईश्वर ने जीवन के लिए चुना था ,
पर आज हर सख्श मृत दिखाई देता है ,
अब ज्यादा मनमानी मत कर रे बंधू ,
ईश्वर सत्य है ,
उसे सब दिखाई देता है


मधुर त्यागी